1फिर ईसा' रूह-उल-कुद्दूस से भरा हुआ यरदन से लौटा, और चालीस दिन तक रूह की हिदायत से वीराने में फिरता रहा;
2और शैतान उसे आज़माता रहा | उन दिनों में उसने कुछ न खाया, जब वो दिन पुरे हो गए तो उसे भूख लगी |
3और शैतान ने उससे कहा, "अगर तू खुदा का बेटा है तो इस पत्थर से कह कि रोटी बन जाए |"
4ईसा' ने उसको जवाब दिया, "लिखा है कि, आदमी सिर्फ रोटी ही से जीता न रहेगा |"
5और शैतान ने उसे ऊँचे पर ले जाकर दुनिया की सब सल्तनतें पल भर में दिखाईं |
6और उससे कहा, "ये सारा इखतियार और उनकी शान-ओ-शौकत मैं तुझे दे दूँगा, क्यूँकि ये मेरे सुपुर्द है और जिसको चाहता हूँ देता हूँ |"
7पस अगर तू मेरे आगे सज्दा करे, तो ये सब तेरा होगा |"
8ईसा' ने जवाब में उससे कहा, "लिखा है कि, तू खुदावन्द अपने खुदा को सिजदा कर और सिर्फ उसकी 'इबादत कर |"
9और वो उसे यरूशलीम में ले गया और हैकल के कंगूरे पर खड़ा करके उससे कहा, "अगर तू खुदा का बेटा है तो अपने आपको यहाँ से नीचे गिरा दे |
10क्यूँकि लिखा है कि, वो तेरे बारे मे अपने फरिश्तों को हुक्म देगा कि तेरी हिफाज़त करें |
11और ये भी कि वो तुझे हाथों पर उठा लेंगे, काश की तेरे पाँव को पत्थर से ठेस लगे |'
12ईसा' ने जवाब में उससे कहा, "फ़रमाया गया है कि, तू खुदावन्द अपने खुदा की आज़माइश न कर |"
13जब इब्लीस तमाम आज़माइशें कर चुका तो कुछ 'अर्से के लिए उससे जुदा हुआ |
14फिर ईसा'रूह की कुव्वत से भरा हुआ गलील को लौटा और आसपास में उसकी शोहरत फ़ैल गई |
15और वो उनके 'इबादतखानों में ता'लीम देता रहा और सब उसकी बड़ाई करते रहे |
16और वो नासरत में आया जहाँ उसने परवरिश पाई थी और अपने दस्तूर के मुवाफ़िक सबत के दिन 'इबादतखाने में गया और पढ़ने को खड़ा हुआ |
17और यसायह नबी की किताब उसको दी गई, और किताब खोलकर उसने वो वर्क खोला जहाँ ये लिखा था :
18"खुदावन्द का रूह मुझ पर है, इसलिए कि उसने मुझे गरीबों को खुशखबरी देने के लिए मसह किया; उसने मुझे भेजा है कैदियों को रिहाई और अन्धों को बीनाई पाने की ख़बर सूनाऊँ, कुचले हुओं को आज़ाद करूँ |
19और खुदावन्द के साल-ए-मकबूल का एलान करूँ |
20फिर वो किताब बन्द करके और ख़ादिम को वापस देकर बैठ गया; जितने 'इबादतखाने में थे सबकी आँखें उस पर लगी थीं |
21वो उनसे कहने लगा, "आज ये लिखा हुआ तुम्हारे सामने पूरा हुआ |"
22और सबने उस पर गवाही दी और उन पुर फज़ल बातों पर जो उसके मुँह से निकली थी, ता'ज्जुब करके कहने लगे, "क्या ये यूसुफ़ का बेटा नहीं?"
23उसने उनसे कहा "तुम अलबता ये मसल मुझ पर कहोगे कि, 'ऐ हकीम, अपने आप को तो अच्छा कर ! जो कुछ हम ने सुना है कि कफरनहुम में किया गया, यहाँ अपने वतन में भी कर'|"
24और उसने कहा, "मैं तुम से सच कहता हूँ, कि कोई नबी अपने वतन में मकबूल नहीं होत्ता |"
25और मैं तुम से कहता हूँ, कि एलियाह के दिनों में जब साढ़े तीन बरस आसमान बन्द रहा, यहाँ तक कि सारे मुल्क में सख्त काल पड़ा, बहुत सी बेवायें इस्राईल में थीं |
26लेकिन एलियाह उनमें से किसी के पास न भेजा गया, मगर मुल्क-ए-सैदा के शहर सारपत में एक बेवा के पास
27और इलिशा नबी के वक़्त में इस्राईल के बीच बहुत से कोढ़ी थे, लेकिन उनमे से कोई पाक साफ़ न किया गया मगर ना'मान सूरयानी |"
28जितने 'इबादतखाने में थे, इन बातों को सुनते ही गुस्से से भर गए,
29और उठकर उस को बाहर निकाले और उस पहाड़ की चोटी पर ले गए जिस पर उनका शहर आबाद था, ताकि उसको सिर के बल गिरा दें |
30मगर वो उनके बीच में से निकलकर चला गया |
31फिर वो गलील के शहर कफरनहूम को गया और सबत के दिन उन्हें ता'लीम दे रहा था |
32और लोग उसकी ता'लीम से हैरान थे क्यूँकि उसका कलाम इख्तियार के साथ था |
33इबादतख़ाने में एक आदमी था, जिसमें बदरूह थी | वो बड़ी आवाज़ से चिल्ला उठा कि,
34"ऐ ईसा' नासरी हमें तुझ से क्या काम? क्या तू हमें हलाक करने आया है? मैं तुझे जानता हूँ कि तू कौन है -खुदा का कुद्दूस है |"
35ईसा' ने उसे झिड़क कर कहा, "चुप रह और उसमें से निकल जा |" इस पर बदरुह उसे बीच में पटक कर बगैर नुकसान पहूँचाए उसमें से निकल गई |
36और सब हैरान होकर आपस में कहने लगे, "ये कैसा कलाम है?" क्यूँकि वो इख़्तियार और क़ुदरत से नापाक रूहों को हुक्म देता है और वो निकल जाती हैं |"
37और आस पास में हर जगह उसकी धूम मच गई |
38फिर वो 'इबादतखाने से उठकर शामा'ऊन की सास जो बुखार मे पड़ी हुई थी और उन्होंने उस के लिए उससे 'अर्ज़ की |
39वो खड़ा होकर उसकी तरफ़ झुका और बुखार को झिड़का तो वो उतर गया, वो उसी दम उठकर उनकी ख़िदमत करने लगी |
40और सूरज के डूबते वक़्त वो सब लोग जिनके यहाँ तरह-तरह की बीमारियों के मरीज़ थे, उन्हें उसके पास लाए और उसने उनमें से हर एक पर हाथ रख कर उन्हें अच्छा किया |
41और बदरूहें भी चिल्लाकर और ये कहकर कि, "तू खुदा का बेटा है" बहुतों में से निकल गई, और वो उन्हें झिड़कता और बोलने न देता था, क्यूँकि वो जानती थीं के ये मसीह है |
42जब दिन हुआ तो वो निकल कर एक वीरान जगह में गया, और भीड़ की भीड़ उसको ढूँढती हुई उसके पास आई, और उसको रोकने लगी कि हमारे पास से न जा |
43उसने उनसे कहा, "मुझे और शहरों में भी ख़ुदा की बादशाही की खुशखबरी सुनाना ज़रूर है, क्यूँकि मैं इसी लिए भेजा गया हूँ |"
44और वो गलील के 'इबाद्तखानों में एलान करता रहा |