1और याकूब ने भी अपनी राह ली और ख़ुदा के फ़िरिश्ते उसे मिले।
2और याकूब ने उनको देख कर कहा, के ये ख़ुदा का लश्कर है और उस जगह का नाम महनाइम रख्खा।
3और याकूब ने अपने आगे-आगे क़ासिदों को अदोम के मुल्क को, जो शईर की सर-ज़मीन में है, अपने भाई ऐसौ के पास भेजा,
4और उनको हुक्म दिया, कि तुम मेरे ख़ुदावन्द ऐसौ से ये कहना कि आपका बन्दा याकूब कहता है,कि मै लाबन के हाँ मूक़ीम था और अब तक वहीं रहा |
5और मेरे पास गाय बैल गधे और भेड़ बकरियाँ और नौकर चाकर और लौंडियाँ है और मै अपने ख़ुदावन्द के पास इसलिए ख़बर भेजता हूँ कि मुझ पर आप के करम की नज़र हो
6पस क़ासिद या'क़ूब के पास लौट कर आए और कहने लगे कि हम भाई ऐसौ के पास गए थे ;वह चार सौ आदमियों को साथ लेकर तेरी मुलाक़ात को आ रहा है
7तब या'क़ूब निहायत डर गया और परीशान हो और उस ने अपने साथ के लोगों और भेड़ बकरियों और गाये बैलों और ऊंटों के दो ग़ोल किए
8और सोचा कि ऐसौ एक ग़ोल पर आ पड़े और उसे मारे तो दुसरा ग़ोल बच कर भाग जाएगा
9और या'क़ूब ने कहाँ ऐ मेरे बापअब्राहम के ख़ुदा और मेरे बाप इज़्हाक के ख़ुदा !ऐ ख़ुदावन्द जिस ने मुझे ये फ़रमाया कि तू अपने मुल्क को अपने रिशातादारों के पास लौट जा और मैं तेरे साथ भलाई करूँगा
10मै तेरी सब रहमतों और वफ़ादारी के मुक़ाबला में जो तूने अपने बन्दा के साथ बरती है बिल्कुल हेच हूँ क्यूँकि मै सिर्फ़ अपनी लाठी लेकर इस यरदन के पार गया था और अब ऐसा हूँ कि मेरे दो ग़ोल हैं
11मैं तेरे मिन्नत करता हूँ कि मुझे मेरे भाई ऐसौ के हाथ से बचा ले क्यूँकि मै उस से डरता हूँ कि कहीं वह आकर मुझे और बच्चों को माँ समेत मार न डाले
12ये तेरा ही फ़रमान है कि मैं तेरे साथ ज़रूर भलाई करूँगा और तेरी नस्ल को दरिया की रेत की मानिंद बनाऊंगा जो कशरत के सबब से गिनी नहीं जा सकती |
13और वह उस रात वही रहा और जो उसके पास था उस में से अपने भाई ऐसौ के लिए यह नज़राना लिया |
14दो सौ बकरियां और बीस बकरे ;दो सौ भेड़ें और बीस मेंढ़े |
15और तीस दूध देने वाली ऊंटनीयां बच्चों समेत और चालीस गए और दस बैल बीस गधियाँ और दस गधे
16और उनको जुदा-जुदा ग़ोल कर के नौकरों को सौपना और उन से कहा कि तुम मेरे आगे आगे पार जाओ और ग़ोलों को ज़रा दूर दूर रखना |
17और उसने सब से अगले ग़ोल के रखवाले को हुक्म दिया कि जब मेरा भाई 'एसो तुझे मिले और तुझ से पूछे कि तू किस का नौकर है और कहाँ जाता है और ये जानवर जो तेरे आगे आगे हैं किस के हैं ?
18तू कहना कि ये तेरे ख़ादिम या'क़ूब के हैं ,ये नज़राना है जो मेरे ख़ुदावन्द 'ऐसौ के लिए भेजा गया है और वह ख़ुद भी हमारे पीछे पीछे आ रहा है |
19और उस ने दूसरे और तीसरे को ग़ोलों के सब रखवालों को हुक्म दिया कि जब 'एसौ तुमको मिले तो तुम यही बात कहना |
20और ये भी कहना कि तेरा ख़ादिम या'कूब ख़ुद भी हमारे पीछे पीछे आ रहा है ,उस ने ये सोचा कि मैं इस नज़राना से जो मुझ से पहले वहां जायेगा उसे राजी कर लूँ ,तब उस का मुँह देखूँगा , शायद यूं वह मुझको क़ुबूल कर ले |
21चुनाँचे वह नज़राना उसके आगे आगे पार गया पर वह ख़ुद उस रात अपने डेरे में रहा |
22और वह उसी रात उठा और अपनी दोनों बीवियों दोनों लौंडियों और ग्यारह बेटों को लेकर उनको यबूक के घाट से पार उतारा |
23और उनको लेकर नदी पार कराया और अपना सब कुछ पार भेज दिया |
24और या'कूब अकेला रह गया और पौ फटने के वक़्त तक एक शख्स वहाँ उस से कुश्ती लड़ता रहा |
25जब उसने देखा के वो उस पर ग़ालिब नहीं होता, तो उसकी रान को अन्दर की तरफ़ से छुआ और याकूब की रान की नस उसके साथ कुश्ती करने में चढ़ गई।
26और उसने कहा, "मुझे जाने दे क्यूँके पौ फट चली,” याकूब ने कहा, "जब तक तू मुझे बरकत न दे, मैं तुझे जाने नहीं दूँगा।"
27तब उसने उससे पूछा, "तेरा क्या नाम है? उसने जवाब दिया, "याकूब।"
28उसने कहा, "तेरा नाम आगे को याकूब नहीं बल्के इस्राईल होगा, क्यूँके तूने ख़ुदा और आदमियों के साथ ज़ोर आज़माई की और ग़ालिब हुआ।"
29तब याकूब ने उससे कहा, "मैं तेरी मिन्नत करता हूँ, तू मुझे अपना नाम बता दे।" उसने कहा, "तू मेरा नाम क्यूँ पूछता है?” और उसने उसे वहाँ बरकत दी।
30और याकूब ने उस जगह का नाम फ़नीएल रख्खा और कहा, "मैंने ख़ुदा को रू-ब-रू देखा, तौ भी मेरी जान बची रही।"
31और जब वो फ़नीएल से गुज़र रहा था तो आफ़ताब तुलू हुआ और वो अपनी रान से लंगड़ाता था।
32इसी सबब से बनी इस्राईल उस नस की जो रान में अन्दर की तरफ़ है आज तक नहीं खाते, क्यूँके उस शख़्स ने याकूब की रान की नस को जो अन्दर की तरफ़ से चढ़ गई थी छू दिया था।