1और जब राखिल ने देखा के याकूब से उसके औलाद नहीं होती तो राखिल को अपनी बहन पर रश्क आया, सो वो याकूब से कहने लगी, "मुझे भी औलाद दे नहीं तो मैं मर जाऊँगी।"
2तब याक़ूब का क़हर राखिल पर भड़का और उस ने कहा "क्या मैं ख़ुदा की जगह हूँ जिसने तुझ को औलाद से महरूम रख्खा है?"
3उसने कहा, "देख, मेरी लौंडी बिल्हाह हाज़िर है, उसके पास जा ताके मेरे लिए उससे औलाद हो और वी औलाद मेरी ठहरे।"
4और उसने अपनी लौंडी बिल्हाह को उसे दिया के उसकी बीवी बने, और याकूब उसके पास गया।
5और बिल्हाह हामिला हुई, और याकूब से उसके बेटा हुआ।
6तब राखिल ने कहा,कि "ख़ुदा ने मेरा इंसाफ़ किया और मेरी फ़रियाद भी सुनी और मुझ को बेटा बख़्शा।" इसलिए उसने उसका नाम दान रखा।
7और राखिल की लौंडी बिल्हाह फिर हामिला हुई और याकूब से उसके दूसरा बेटा हुआ।
8तब राखिल ने कहा, "मैं अपनी बहन के साथ निहायत ज़ोर मार-मारकर कुश्ती लड़ी और मैंने फ़तह पाई।" सो उसने उसका नाम नफ़्ताली* रख्खा।
9जब लियाह ने देखा के वो जनने से रह गई तो उसने अपनी लौंडी ज़िलफ़ा को लेकर याकूब को दिया के उसकी बीवी बने।
10और लियाह की लौंडी ज़िलफा के भी याकूब से एक बेटा हुआ।
11तब लियाह ने कहा, "ज़हे-किस्मत!" सो उसने उसका नाम जद* रख्खा।
12लियाह की लौंडी ज़िलफ़ा के याकूब से फिर एक बेटा हुआ।
13तब लियाह ने कहा, "मैं ख़ुश क़िस्मत हूँ: 'औरतें* मुझे खुश क़िस्मत कहेंगी।" और उसने उसका नाम आशरी रख्खा ।
14और रूबिन गेहूँ काटने के मौसिम में घर से निकला और उसे खेत में मदुम गियाह मिल गए, और वो अपनी माँ लियाह के पास ले आया। तब राखिल ने लियाह से कहा, किअपने बेटे के मदुम गियाह में से मुझे भी कुछ दे दे।"
15उसने कहा, "क्या ये छोटी बात है के तूने मेरे शौहर को ले लिया, और अब क्या मेरे बेटे के मदुम गियाह भी लेना चाहती है?" राखिल ने कहा, "बस तो आज रात वो तेरे बेटे के मदुम गियाह की ख़ातिर तेरे साथ सोएगा।"
16जब याकूब शाम को खेत से आ रहा था तो लियाह आगे से उससे मिलने की गई और कहने लगी,कि "तुझे मेरे पास आना होगा, क्यूँके मैंने अपने बेटे के मदुम गियाह के बदले तुझे उजरत पर लिया है।" सी वो उस रात उसी के साथ सोया।
17और ख़ुदा ने लियाह की सुनी और वो हामिला हुई, और याकूब से उसके पाँचवाँ बेटा हुआ।
18तब लियाह ने कहा, "ख़ुदा ने मेरी उजरत मुझे दी क्यूँके मैंने अपने शौहर को अपनी लौंडी दी।" और उसने उसका नाम इश्कार* रखा।
19और लियाह फिर हामिला हुई और याकूब से उसके छटा बेटा हुआ।
20तब लियाह ने कहा, "ख़ुदा ने अच्छा महर मुझे बख़्शा; अब मेरा शौहर मेरे साथ रहेगा क्यूँके मेरे उससे छ: बेटे हो चुके हैं।" सो उसने उसका नाम ज़बूलून* रख्खा।
21इसके बाद उसके एक बेटी हुई और उसने उसका नाम दीना रख्खा।
22और ख़ुदा ने राख़िल को याद किया, और ख़ुदा ने उसकी सुन कर उसके रिहम को खोला।
23और वो हामिला हुई और उसके बेटा हुआ, तब उसने कहा, "ख़ुदा ने मुझ से रुस्वाई दूर की।"
24और उस ने उसका नाम युसुफ़ ये कह कर रख्खा कि ख़ुदा वन्द मुझ को एक और बेटा बख्शे |
25और जब राखिल से युसुफ़ पैदा हुआ तो याकूब ने लाबन से कहा, "मुझे रुख्सत कर के मैं अपने घर और अपने वतन को जाऊँ।
26मेरी बीवियाँ और मेरे बाल बच्चेजिनकी खातिर मैं ने तेरी ख़िदमत की है मेरे हवाले कर और मुझे जाने दे, क्यूँके तू आप जानता है के मैंने तेरी कैसी खिदमत की है।"
27तब लाबन ने उसे कहा, "अगर मुझ पर तेरे करम की नज़र है तो यहीं रह क्यूँके मैं जान गया हूँ के ख़ुदावन्द ने तेरे सबब से मुझ को बरकत बख़्शी है।"
28और ये भी कहा,कि "मुझ से तू अपनी उजरत ठहरा ले, और मैं तुझे दिया करूंगा।"
29उसने उसे कहा,कि "तू आप जानता है के मैंने तेरी कैसी खिदमत की और तेरे जानवर मेरे साथ कैसे रहे।
30क्यूँके मेरे आने से पहले ये थोड़े थे और अब बढ़ कर बहुत से हो गए हैं, और ख़ुदावन्द ने जहाँ जहाँ मेरे क़दम पड़े तुझे बरकत बख्शी। अब मैं अपने घर का बन्दोबस्त कब करूं?"
31उसने कहा, "तुझे मैं क्या दूँ?" याकूब ने कहा, "तू मुझे कुछ न देना, पर अगर तू मेरे लिए एक काम कर दे तो मैं तेरी भेड़-बकरियों को फिर चराऊँगा और उनकी निगहबानी करूंगा।
32मैं आज तेरी सब भेड़-बकरियों में चक्कर लगाऊँगा, और जितनी भेड़ें चितली और अबलक और काली हों और जितनी बकरियाँ अबलक और चितली हों उन सबको अलग एक तरफ़ कर दूँगा, इन्हीं को मैं अपनी उजरत ठहराता हूँ।
33और आइन्दा जब कभी मेरी उजरत का हिसाब तेरे सामने ही तो मेरी सदाक़त आप मेरी तरफ़ से इस तरह बोल उठेगी, के जो बकरियाँ चितली और अबलक नहीं और जो भेड़े काली नहीं अगर वो मेरे पास हों तो चुराई हुई समझी जाएँगी।"
34लाबन ने कहा, "मैं राज़ी हूँ, जो तू कहे बुही सहीह।"
35और उसने उसी रोज़ धारीदार और अबलक बकरों की और सब चितली और अबलक बकरियों को जिनमें कुछ सफ़ेदी थी, और तमाम काली भेड़ों को अलग करके उनकी अपने बेटों के हवाले किया।
36और उसने अपने और याकूब के दर्मियान तीन दिन के सफ़र का फ़ासला ठहराया; और याकूब लाबन के बाकी रेवड़ों को चराने लगा।
37और याकूब ने सफ़ेदा और बादाम, उनको छील छीलकर इस तरह गन्डेदार बना लिया के उन छड़ियों की सफ़ेदी दिखाई देने लगी।
38और उसने वो गन्डेदार छड़ियाँ भेड़-बकरियों के सामने हौज़ों और नालियों में जहाँ वो पानी पीने आती थीं खड़ी कर दीं, और जब वो पानी पीने आई सी गाभिन हो गई।
39और उन छड़ियों के आगे गाभिन होने की वजह से उन्होने धारीदार, चितले और अबलक बच्चे दिए।
40और याकूब ने भेड़ बकरियों के उन बच्चों को अलग किया, और लाबन की भेड़-बकरियों के मुँह धारीदार और काले बच्चों की तरफ़ फेर दिए और उसने अपने रेवड़ों को जुदा किया, और लाबन की भेड़ बकरियों में मिलने न दिया।
41और जब मज़बूत भेड़-बकरियाँ गाभिन होती थीं तो याकूब छड़ियों को नालियों में उनकी आँखों के सामने रख देता था, ताके वो उन छड़ियों के आगे गाभिन हों।
42पर जब भेड़ बकरियाँ दुबली होतीं तो वो उनको वहाँ नहीं रखता था। सो दुबली तो लाबन की रहीं और मज़बूत याकूब की हो गई।
43चुनाँचे वो निहायत बढ़ता गया और उसके पास बहुतसे रेवड़ और लौंडिया और नौकर चाकर और ऊंट और गधे हो गये |