1और तमाम ज़मीन पर एक ही ज़बान् और एक ही बोली थी।
2और ऐसा हुआ के मशरिक़ की तरफ़ सफ़र करते करते उनको मुल्क-ए-सिन'आर में एक मैदान् मिला और वो वहाँ बस गए।
3और उन्होंने आपस में कहा, 'आओ, हम ईटें बनाएँ और उनको आग में खूब पकाएँ। सो उन्होंने पत्थर की जगह ईट से और चूने की जगह गारे स् काम लिया।
4फिर वो कहने लगे, कि आओ हम अपने वास्ते एक शहर और एक बुर्ज जिसकी चोटी आसमान तक पहुँचे बनाए और यहाँ अपना नाम करें, ऐसा न हो के हम तमाम रु-ए-ज़मीन पर परगन्दा हो जाएँ | |
5और ख़ुदावन्द इस शहर और बुर्ज, को जिसे बनी आदम बनाने लगे देखने को उतरा।
6और ख़ुदावन्द ने कहा, "देखो, ये लोग सब एक हैं और इन सभों की एक ही ज़बान है। वो जो ये करने लगे हैं तो अब कुछ भी जिसका वो इरादा करें उनसे बाक़ी न छूटेगा।
7सी आओ, हम वहाँ जाकर उनकी ज़बान में इख्तिलाफ़ डालें, ताके वो एक दूसरे की बात समझ न सकें।"
8पस, ख़ुदावन्द ने उनको वहाँ से तमाम रू-ए-ज़मीन में परागन्दा किया; सी वो उस शहर के बनाने से बाज़ आए।
9इसलिए उसका नाम बाबुल हुआ क्यूँके ख़ुदावन्द ने वहाँ सारी ज़मीन की ज़बान में इख्तिलाफ़ डाला और वहाँ से ख़ुदावन्द ने उनकी तमाम रू-ए-ज़मीन पर परागन्दा किया।
10ये सिम का नसबनामा है : सिम एक सौ बरस का था जब उससे तूफ़ान के दो बरस बाद अरफ़कसद पैदा हुआ;
11और अरफ़कसद की पैदाइश के बाद सिम पाँच सौ बरस जीता रहा, और उससे बेटे और बेटियाँ पैदा हुई।
12जब अरफ़कसद पैतीस बरस का हुआ, तो उससे सिलह पैदा हुआ;
13और सिलह की पैदाइश के बाद अरफ़कसद चार सौ तीन बरस और जीता रहा, और उससे बेटे और बेटियाँ पैदा हुई।
14सिलह जब तीस बरस का हुआ, तो उससे इब्र पैदा हुआ;
15और इब्र की पैदाइश के बाद सिलह चार सौ तीन बरस और जीता रहा, और उससे बेटे और बेटियाँ पैदा हुई।
16जब इब्र चौंतीस बरस का था. तो उससे फ़लज पैदा हुआ;
17और फ़लज की पैदाइश के बाद इब्र चार सौ तीस बरस और जीता रहा, और उससे बेटे और बेटियाँ पैदा हुई |
18फ़लज तीस बरस का था, जब उससे र'ऊ पैदा हुआ;
19और र'ऊ की पैदाइश के बाद फ़लज दो सौ नौ बरस और जीता रहा, और उससे बेटे और बेटियाँ पैदा हुई।
20और र'ऊ बत्तीस बरस का था, जब उससे सरूज पैदा हुआ;
21और सरूज की पैदाइश के बा'द र'ऊ दो सौ सात बरस और जीता रहा, और उससे बेटे और बेटियाँ पैदा हुई |
22और सरूज तीस बरस का था, जब उससे नहूर पैदा हुआ |
23और नहूर की पैदाइश के बाद सरूज दो सौ बरस और जीता रहा, और उससे बेटे और बेटियाँ पैदा हुईं |
24नहूर उन्तीस बरस का था, जब उससे तारह पैदा हुआ |
25और तारह की पैदाइश के बाद नहूर एक सौ उन्नीस बरस और जीता रहा, और उससे बेटे और बेटियाँ पैदा हुई।
26और तारह सतर बरस का था, जब उससे अब्राम और नहूर और हारान पैदा हुए |
27और ये तारह का नसबनामा है : तारह से अब्राम और नहूर और हारान पैदा हुए और हारान से लूत पैदा हुआ।
28और हारान अपने बाप तारह के आगे अपनी जाद बूम यानी कसदियों के ऊर में मरा।
29और अब्राम और नहूर ने अपना-अपना ब्याह कर लिया। अब्राम की बीवी का नाम सारय और नहुर की बीवी का नाम मिल्का था जो हारान की बेटी थी। वुही मिल्का का बाप और इस्का का बाप था।
30और सारयी बाँझ थी; उसके कोई बाल-बच्चा न था।
31और तारह ने अपने बेटे अब्राम को और अपने पोते लूत को, जो हारान का बेटा था, और अपनी बहू सारय को जो उसके बेटे अब्राम की बीवी थी, साथ लिया और वो सब कसदियों के ऊर से रवाना हुए के कनान के मुल्क में जाएँ; और वो हारान तक आए और वहीं रहने लगे।
32और तारह की उम्र दो सौ पाँच बरस की हुई और उस ने हारान में वफ़ात पाई।