1जब 'अज़्रा ख़ुदा के घर के आगे रो रो कर और औधे मुँह गिरकर दु'आ और इकरार कर रहा था, तो इस्राईल में से मदों और 'औरतों और बच्चों की एक बहुत बड़ी जमा'अत उसके पास फ़राहम हो गई; और लोग फूट फूटकर रो रहे थे।
2तब सिकनियाह बिन यहीएल जो बनी ऐलाम में से था, 'अज़्रा से कहने लगा, हम अपने ख़ुदा के गुनाहगार तो हुए हैं, और इस सरज़मीन की क़ौमों में से अजनबी 'औरतें ब्याह ली हैं, तौभी इस मुआमिले में अब भी इस्राईल के लिए उम्मीद है।
3सो अब हम अपने मखदूम की और उनकी सलाह के मुताबिक़, जो हमारे ख़ुदा के हुक्म से काँपते हैं, सब बीवियों और उनकी औलाद को दूर करने के लिए अपने ख़ुदा से 'अहद बाँधे, और ये शरी'अत के मुताबिक़ किया जाए।
4पस उठ, क्यूँकि ये तेरा ही काम है, और हम तेरे साथ हैं, हिम्मत बाँध कर काम में लग जा।
5तब 'अज़ा ने उठकर सरदार काहिनों और लावियों और सारे इस्राईल से क़सम ली कि वह इस इक़रार के मुताबिक़ 'अमल करेंगे; और उन्होंने क़सम खाई।
6तब 'अज़्राख़ुदा के घर के सामने से उठा और यहूहानान बिन इलियासिब की कोठरी में गया, और वहाँ जाकर न रोटी खाई न पानी पिया; क्यूँकि वह असीरी के लोगों की ख़ता के सबब से मातम करता रहा।
7फिर उन्होंने यहूदाह और यरूशलीम में असीरी के सब लोगों के दर्मियान मनादी की, कि वह यरूशलीम में इकट्ठे हो जाएँ;
8और जो कोई सरदारों और बुज़ुगों की सलाह के मुताबिक़ तीन दिन के अन्दर न आए, उसका सारा माल ज़ब्त हो और वह ख़ुद असीरों की जमा'अत से अलग किया जाए।
9तब यहूदाह और बिनयमीन के सब मर्द उन तीन दिनों के अन्दर यरूशलीम में इकट्ठे हुए; महीना नवाँ था, और उसकी बीसवीं तारीख़ थी; और सब लोग इस मु'आमिले और बड़ी बारिश के सबब से ख़ुदा के घर के सामने के मैदान में बैठे काँप रहे थे।
10तब 'अज़्रा काहिन खड़ा होकर उनसे कहने लगा कितुम ने ख़ता की है और इस्राईल का गुनाह बढ़ाने को अजनबी 'औरतें ब्याह ली हैं।
11पस ख़ुदावन्द अपने बाप-दादा के ख़ुदा के आगे इकरार करो, और उसकी मज़ों पर 'अमल करो, और इस सरज़मीन के लोगों और अजनबी 'औरतों से अलग हो जाओ।
12तब सारी जमा'अत ने जवाब दिया, और बलन्द आवाज़ से कहा, जैसा तू ने कहा, वैसा ही हम को करना लाज़िम है।
13लेकिन लोग बहुत हैं, और इस वक्त शिद्दत की बारिश हो रही है और हम बाहर खड़े नहीं रह सकते, और न ये एक दो दिन का काम है; क्यूँकि हम ने इस मु'आमिले में बड़ा गुनाह किया है।
14अब सारी जमा'अत के लिए हमारे सरदार मुक़र्रर हों, और हमारे शहरों में जिन्होंने अजनबी 'औरतें ब्याह ली हैं, वह सब मुक़र्ररा वक़्तों पर आएँ और उनके साथ हर शहर के बुज़ुर्ग और क़ाज़ी हों, जब तक के हमारे ख़ुदा काकहर-ए-शदीद हम पर से टल न जाए और इस मुआमिले का तसफ़ियाह न हो जाए।
15फ़क़त यूनतन बिन 'असाहेल और यहाजियाह बिन तिकवह इस बात के खिलाफ खड़े हुए, और मसुल्लाम और सब्बती लावी ने उनकी मदद की।
16पर असीरी के लोगों ने वैसा ही किया। और अज़्राकाहिन और आबाई खान्दानों के सरदारों में से बा'ज़ अपने अपने आबाई खान्दानों की तरफ़ से सब नाम-ब-नाम अलग किए गए, और वह दसवें महीने की पहली तारीख़ को इस बात की तहकीकात के लिए बैठे;
17और पहले महीने के पहले दिन तक, उन सब मदों के मुआमित्ने का फ़ैसला किया जिन्होंने अजनबी 'औरतें ब्याह ली थीं।
18और काहिनों की औलाद में ये लोग मिले जिन्होंने अजनबी 'औरतें ब्याह ली थीं : यानी, बनी यशूअ में से, यूसद्क का बेटा, और उसके भाई मासियाह और इली'अज़र और यारिब और जिदलियाह।
19उन्होंने अपनी बीवियों को दूर करने का वादा किया, और गुनाहगार होने के सबब से उन्होंने अपने गुनाह के लिए अपने अपने रेवड़ में से एक एक मेंढा कुर्बान किया।
20और बनी इम्मेर में से, हनानी और ज़बदियाह;
21और बनी हारिम में से, मासियाह और इलियाह, और समा'याह और यहीएल और उज़ियाह;
22और बनी फ़शहूर में से, इल्यूऐनी और मासियाह और इस्माईल और नतनीएल और यूज़बाद और इलि सा।
23और लावियों में से, यूज़बाद और सिमई और किलायाह (जो क़लीता भी कहलाता है), फ़तहयाह और यहूदाह और इली'अज़र;
24और गानेवालों में से, इलियासिब; और दरबानों में से, सलूम और तलम और ऊरी।
25और इस्राईल में से : बनी पर'ऊस में से, रमियाह और यज़ियाह और मलकियाह और मियामीन और इली'अज़र और मलकियाह और बिनायाह
26और बनी ऐलाम में से, मतनियाह और ज़करियाह और यहीएल और 'अबदी और यरीमीत और इलियाह;
27और बनी ज़त्तू में से, इल्यूऐनी और इलियासिब और मत्तनियाह और यरीमीत और ज़ाबाद और 'अज़ीज़ा,
28और बनी बबई में से, यहूहानान और हननियाह और ज़ब्बी और 'अतलै
29और बनी बानी में से, मसुल्लाम और मलूक और 'अदायाह और यासूब और सियाल और यरामोत।
30और बनी पख़त-मोआब में से, 'अदना और किलाल और बिनायाह और मासियाह और मत्तनियाह और बज़लीएल और बिनवी और मनस्सी,
31और बनी हारिम में से, इली'अज़र और यशियाह और मलकियाह और समा'याह और शमा'ऊन,
32बिनयमीन और मलूक और समरियाह;
33और बनी हाशूम में से, मत्तनै और मतताह और ज़ाबाद और इलीफ़लत और यरीमै और मनस्सी और सिमई,
34और बनी बानी में से, मा'दै और 'अमराम और ऊएल,
35बिनायाह और बदियाह और कलूह,
36अौर वनियाह और मरीमोत और इलियासिब,
37और मत्तनियाह और मत नै और या 'सौ,
38और बानी और बिनवी और सिम'ई,
39और सलमियाह और नातन और 'अदायाह,
40मकनदबै, सासै, सारै
41'अज़रिएल और सलमियाह, समरियाह,
42सलूम, अमरियाह, यूसुफ़।
43बनी नबू में से, य'ईएल, मतित्तियाह, ज़ाबाद, ज़बीना, यददो और यूएल, बिनायाह।
44ये सब अजनबी 'औरतों को ब्याह लाए थे, और बाज़ों की बीवियाँ ऐसी थीं जिनसे उनके औलाद थी।