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1हाय, पंखों की फड़फड़ाहट से भरे हुए देश, तू जो कूश की नदियों के परे है;

2और समुद्र पर दूतों को नरकट की नावों में बैठाकर जल के मार्ग से यह कह के भेजता है, हे फुर्तीले दूतो, उस जाति के पास जाओ जिसके लोग बलिष्‍ट और सुन्‍दर हैं, जो आदि से अब तक डरावने हैं, जो मापने और रौंदनेवाला भी हैं, और जिनका देश नदियों से विभाजित किया हुआ है।

3हे जगत के सब रहनेवालों, और पृथ्‍वी के सब निवासियों, जब झण्डा पहाड़ों पर खड़ा किया जाए, उसे देखो! जब नरसिंगा फूँका जाए, तब सुनो!

4क्‍योंकि यहोवा ने मुझसे यों कहा है, “धूप की तेज गर्मी या कटनी के समय के ओसवाले बादल के समान मैं शान्‍त होकर निहारूँगा।

5क्‍योंकि दाख तोड़ने के समय से पहले जब फूल, फूल चुकें, और दाख के गुच्‍छे पकने लगें, तब वह टहनियों को हँसुओं से काट डालेगा, और फैली हुई डालियों को तोड़-तोड़कर अलग फेंक देगा।

6वे पहाड़ों के मांसाहारी पक्षियों और वन-पशुओं के लिये इकट्ठे पड़े रहेंगे। और मांसाहारी पक्षी तो उनको नोचते-नोचते धूपकाल बिताएँगे, और सब भाँति के वनपशु उनको खाते-खाते जाड़ा काटेंगे।

7उस समय जिस जाति के लोग बलिष्‍ट और सुन्‍दर हैं, और जो आदि ही से डरावने होते आए हैं, और मापने और रौंदनेवाले हैं, और जिनका देश नदियों से विभाजित किया हुआ है, उस जाति से सेनाओं के यहोवा के नाम के स्‍थान सिय्‍योन पर्वत पर सेनाओं के यहोवा के पास भेंट पहुँचाई जाएगी।


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