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1तब लोग और उनकी स्‍त्रियों की ओर से उनके भाई यहूदियों के विरुद्ध बड़ी चिल्‍लाहट मची।

2कितने तो कहते थे, “हम अपने बेटे-बेटियों समेत बहुत लोग हैं, इसलिये हमें अन्न मिलना चाहिये कि उसे खाकर जीवित रहें।”

3और कितने कहते थे, “हम अपने अपने खेतों, (दाख की बारियों और घरों को मँहगी के कारण बन्‍धक रखते हैं), कि हमें अन्न मिले।”

4फिर कितने यह कहते थे, “हम ने राजा के कर के लिये अपने अपने खेतों और दाख की बारियों पर रुपया उधार लिया।

5परन्‍तु हमारा और हमारे भाइयों का शरीर और हमारे और उनके बच्चे एक ही समान हैं, तौभी हम अपने बेटे-बेटियों को दास बनाते हैं; वरन हमारी कोई कोई बेटी दासी भी हो चुकी हैं; और हमारा कुछ बस नहीं चलता, क्‍योंकि हमारे खेत और दाख की बारियाँ औरों के हाथ पड़ी हैं।”

6यह चिल्‍लाहट और ये बातें सुनकर मैं बहुत क्रोधित हुआ।

7तब अपने मन में सोच विचार करके मैं ने रईसों और हाकिमों को घुड़ककर होकर कहा, “तुम अपने अपने भाई से ब्‍याज लेते हो।” तब मैं ने उनके विरुद्ध एक बड़ी सभा की।

8और मैं ने उन से कहा, “हम लोगों ने तो अपनी शक्ति भर अपने यहूदी भाइयों को जो अन्‍यजातियों के हाथ बिक गए थे, दाम देकर छुड़ाया है, फिर क्‍या तुम अपने भाइयों को बेचोगे? क्‍या वे हमारे हाथ बिकेंगे?” तब वे चुप रहे और कुछ न कह सके।

9फिर मैं कहता गया, “जो काम तुम करते हो वह अच्‍छा नहीं है; क्‍या तुम को इस कारण हमारे परमेश्‍वर का भय मानकर चलना न चाहिये कि हमारे शत्रु जो अन्‍यजाति हैं, वे हमारी नामधराई न करें?

10मैं भी और मेरे भाई और सेवक उनको रुपया और अनाज उधार देते हैं, परन्‍तु हम इसका ब्‍याज छोड़ दें।

11आज ही उनको उनके खेत, और दाख, और जलपाई की बारियाँ, और घर फेर दो; और जो रुपया, अन्न, नया दाखमधु, और टटका तेल तुम उनसे ले लेते हो, उसका सौवाँ भाग फेर दो?”

12उन्‍हों ने कहा, “हम उन्‍हें फेर देंगे, और उनसे कुछ न लेंगे; जैसा तू कहता है, वैसा ही हम करेंगे।” तब मैं ने याजकों को बुलाकर उन लोगों को यह शपथ खिलाई, कि वे इसी वचन के अनुसार करेंगे।

13फिर मैं ने अपने कपड़े की छोर झाड़कर कहा, “इसी रीति से जो कोई इस वचन को पूरा न करे, उसको परमेश्‍वर झाड़कर, उसका घर और कमाई उस से छुड़ाए, और इसी रीति से वह झाड़ा जाए, और कंगाल हो जाए।” तब सारी सभा ने कहा, “आमीन !” और यहोवा की स्‍तुति की। और लोगों ने इस वचन के अनुसार काम किया।

14फिर जब से मैं यहूदा देश में उनका अधिपति ठहराया गया, अर्थात् राजा अर्तक्षत्र के बीसवें वर्ष से ले उसके बत्‍तीसवें वर्ष तक, अर्थात् बारह वर्ष तक मैं और मेरे भाई अधिपति के हक का भोजन खाते रहे।

15परन्‍तु पहिले अधिपति जो मुझ से आगे थे, वह प्रजा पर भार डालते थे, और उन से रोटी, और दाखमधु, और इसके साथ ** चालीस शेकेल चाँदी लेते थे, वरन उनके सेवक भी प्रजा के ऊपर अधिकार जताते थे; परन्‍तु मैं ऐसा नहीं करता था, क्‍योंकि मैं यहोवा का भय मानता था।

16फिर मैं शहरपनाह के काम में लिपटा रहा, और हम लोगों ने कुछ भूमि मोल न ली; और मेरे सब सेवक काम करने के लिये वहाँ इकट्ठे रहते थे।

17फिर मेरी मेज पर खानेवाले एक सौ पचास यहूदी और हाकिम और वे भी थे, जो चारों ओर की अन्‍यजातियों में से हमारे पास आए थे।

18और जो प्रतिदिन के लिये तैयार किया जाता था वह एक बैल, छः अच्‍छी अच्‍छी भेड़ें व बकरियाँ थीं, और मेरे लिये चिडि़यें भी तैयार की जाती थीं; दस दस दिन के बाद भाँति भाँति का बहुत दाखमधु भी तैयार किया जाता था; परन्‍तु तौभी मैं ने अधिपति के हक का भोज नहीं लिया,

19क्‍योंकि काम का भार प्रजा पर भारी था। हे मेरे परमेश्‍वर ! जो कुछ मैं ने इस प्रजा के लिये किया है, उसे तू मेरे हित के लिये स्‍मरण रख।


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