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1हे परमेश्‍वर, सिय्‍योन में स्‍तुति तेरी बाट जोहती है; और तेरे लिये मन्‍नतें पूरी की जाएँगी।

2हे प्रार्थना के सुननेवाले! सब प्राणी तेरे ही पास आएँगे।(प्रेरि. 10:34-35, यह 66:23)

3अर्धम के काम मुझ पर प्रबल हुए हैं; हमारे अपराधों को तू ढाँप देगा।

4क्‍या ही धन्‍य है वह; जिसको तू चुनकर अपने समीप आने देता है, कि वह तेरे आँगनों में वास करे! हम तेरे भवन के, अर्थात् तेरे पवित्र मन्‍दिर के उत्तम-उत्तम पदार्थों से तृप्‍त होंगे।।

5हे हमारे उद्धारकर्त्ता परमेश्‍वर, हे पृथ्‍वी के सब दूर-दूर देशों के और दूर के समुद्र पर के रहनेवालों के आधार, तू धर्म से किए हुए भयानक कामों के द्वारा हमें मुँह माँगा वर देगा;

6तू जो पराक्रम का फेंटा कसे हुए, अपनी सामर्थ्य के पर्वतों को स्‍थिर करता है;

7तू जो समुद्र का महाशब्‍द, उसकी तरंगो का महाशब्‍द, और देश-देश के लोगों का कोलाहल शान्‍त करता है;(मत्ती 8:26, यह 17:12-13)

8इसलिये दूर-दूर देशों के रहनेवाले तेरे चिन्‍ह देखकर डर गए हैं; तू उदयाचल और अस्‍ताचल देानों से जयजयकार कराता है।

9तू भूमि की सुधि लेकर उसको सींचता हैं, तू उसको बहुत फलदायक करता है; परमेश्‍वर की नदी जल से भरी रहती है; तू पृथ्‍वी को तैयार करके मनुष्‍यों के लिये अन्‍न को तैयार करता है।

10तू रेघारियों को भली भाँति सींचता है, और उनके बीच की मिट्टी को बैठाता है, तू भूमि को मेंह से नरम करता है, और उसकी उपज पर आशीष देता है।

11अपनी भलाई से भरे हुए वर्ष पर तू ने मानो मुकुट धर दिया है; तेरे मार्गों में उत्तम-उत्तम पदार्थ पाए जाते हैं।

12वे जंगल की चराइयों में पाए जाते हैं; और पहाड़ियाँ हर्ष का फेंटा बाँधे हुए है।

13चराइयाँ भेड़-बकरियों से भरी हुई हैं; और तराइयाँ अन्‍न से ढँपी हुई हैं, वे जयजयकार करतीं और गाती भी हैं।


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