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1धन्‍य है यहोवा, जो मेरी चट्टान है, वह मेरे हाथों को लड़ने, और युद्ध करने के लिये तैयार करता है।

2वह मेरे लिये करूणानिधान और गढ़, ऊँचा स्‍थान और छुड़ानेवाला है, वह मेरी ढ़ाल और शरणस्‍थान है, जो मेरी प्रजा को मेरे वश में कर देता है।

3हे यहोवा, मनुष्‍य क्‍या है कि तू उसकी सुधि लेता है, या आदमी क्‍या है, कि तू उसकी कुछ चिन्‍ता करता है?

4मनुष्‍य तो साँस के समान है; उसके दिन ढलती हुई छाया के समान हैं।

5हे यहोवा, अपने स्‍वर्ग को नीचा करके उतर आ! पहाड़ों को छू तब उनसे धुआँ उठेगा!

6बिजली कड़काकर उनको तितर-बितर कर दे, अपने तीर चलाकर उनको घबरा दे!

7अपने हाथ ऊपर से बढ़ाकर मुझे महासागर से उबार, अर्थात् परदेशियों के वश से छुड़ा।

8उनके मुँह से तो व्‍यर्थ बातें निकलती हैं, और उनके दाहिने हाथ से धोखे के काम होते हैं।

9हे परमेश्‍वर, मैं तेरी स्‍तुति का नया गीत गाऊँगा; मैं दस तारवाली सारंगी बजाकर तेरा भजन गाऊँगा।

10तू राजाओं का उद्धार करता है, और अपने दास दाऊद को तलवार की मार से बचाता है।

11मुझ को उबार और परदेशियों के वश से छुड़ा ले, जिनके मुँह से व्‍यर्थ बातें निकलती हैं, और जिनका दाहिना हाथ झूठ का दाहिना हाथ है।

12जब हमारे बेटे जवानी के समय पौधों के समान बढ़े हुए हों, और हमारी बेटियाँ उन कोनेवाले खम्भों के समान हों, जो महल के लिये बनाए जाएँ;

13जब हमारे खत्ते भरे रहें, और उन में भाँति-भाँति का अन्न धरा जाए, और हमारी भेड़-बकरियों हमारे मैदानों में हजारों हजार बच्‍चे जनें;

14जब हमारे बैल खूब लदे हुए हों; जब हमें न विध्‍न हो और न हमारा कहीं जाना हो, और न हमारे चौकों में रोना-पीटना हो,

15तो इस दशा में जो राज्‍य हो वह क्‍या ही धन्‍य होगा! जिस राज्‍य का परमेश्‍वर यहोवा है, वह क्‍या ही धन्‍य है!


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