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1यहोवा परमेश्‍वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था, और उसने स्‍त्री से कहा, “क्‍या सच है, कि परमेश्‍वर ने कहा, ‘तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना’?” (प्रका 12:9,प्रका 20:2)

2स्‍त्री ने सर्प से कहा, “इस वाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं;

3पर जो वृक्ष वाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्‍वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।”

4तब सर्प ने स्‍त्री से कहा, “तुम निश्‍चय न मरोगे! (यूह. 8:44)

5वरन् परमेश्‍वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्‍हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्‍य हो जाओगे।”

6अतः जब स्‍त्री ने देखा* कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्‍छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्‍य भी है, तब उसने उसमें से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया। (रोमि. 5:12,1 तीमु. 2:14)

7तब उन दोनों की आँखें खुल गई, और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे है; इसलिये उन्‍होंने अंजीर के पत्ते जोड़-जोड़ कर लंगोट बना लिये।

8तब यहोवा परमेश्‍वर जो दिन के ठंडे समय वाटिका में फिरता था, उसका शब्‍द उनको सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्‍नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्‍वर से छिप गए।

9तब यहोवा परमेश्‍वर ने पुकारकर आदम से पूछा, “तू कहाँ है?”

10उसने कहा, “मैं तेरा शब्‍द बारी में सुनकर डर गया, क्‍योंकि मैं नंगा था;* इसलिये छिप गया।”

11उसने कहा, “किसने तुझे चिताया कि तू नंगा है? जिस वृक्ष का फल खाने को मैंने तुझे मना किया था, क्‍या तूने उसका फल खाया है?”

12आदम ने कहा, “जिस स्‍त्री को तूने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैंने खाया।”

13तब यहोवा परमेश्‍वर ने स्‍त्री से कहा, “तूने यह क्‍या किया है?” स्‍त्री ने कहा, “सर्प ने मुझे बहका दिया तब मैंने खाया।” (रोम 7:11,2 कुरि 11:3,1 तीमु. 2:14)

14तब यहोवा परमेश्‍वर ने सर्प से कहा, “तूने जो यह किया है इसलिये तू सब घरेलू पशुओं, और सब बनैले पशुओं से अधिक शापित है; तू पेट के बल चला करेगा, और जीवन भर मिट्टी चाटता रहेगा;

15और मै तेरे और इस स्‍त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्‍पन्‍न करुँगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।” (लूका 10:19,रोम 16:20,इब्रा 2:14)

16फिर स्‍त्री से उसने कहा, “मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दु:ख को बहुत बढ़ाऊँगा; तू पीड़ित होकर बालक उत्‍पन्‍न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।” (1 कुरि 11:3इफि 5:22,1 कुरि 13:34,कुलु 3:18)

17और आदम से उसने कहा, “तूने जो अपनी पत्‍नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैंने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना, उसको तूने खाया है, इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है। तू उसकी उपज जीवन भर दु:ख के साथ खाया करेगा;

18और वह तेरे लिये काँटे और ऊँटकटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा; (इब्रा 6:8,1 कुरि 15:21)

19और अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा, और अन्‍त में मिट्टी में मिल जाएगा; क्‍योंकि तू उसी में से निकाला गया है, तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा।” (रोम 5:12,इब्रा 9:27)

20और आदम ने अपनी पत्‍नी का नाम हव्‍वा रखा; क्‍योंकि जितने मनुष्‍य जीवित हैं उन सब की मूलमाता वही हुई।

21और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम और उसकी पत्‍नी के लिये चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहना दिए।

22फिर यहोवा परमेश्‍वर ने कहा, “मनुष्‍य भले बुरे का ज्ञान पाकर हम में से एक के समान हो गया है; इसलिये अब ऐसा न हो, कि वह हाथ बढ़ाकर जीवन के वृक्ष का फल भी तोड़ कर खा ले और सदा जीवित रहे।” (प्रका 2:7,प्रका 22:2,14,19)

23इसलिये यहोवा परमेश्‍वर ने उसको अदन की वाटिका में से निकाल दिया कि वह उस भूमि पर खेती करे जिसमें से वह बनाया गया था।

24इसलिये आदम को उसने निकाल दिया* और जीवन के वृक्ष के मार्ग का पहरा देने के लिये अदन की वाटिका के पूर्व की ओर करुबों को और चारों ओर घूमनेवाली ज्वालामय तलवार को भी नियुक्‍त कर दिया। (प्रका 2:7)


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