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1इन बातों के बाद राजा क्षयर्ष ने अगागी हम्‍मदाता के पुत्र हामान को उच्‍च पद दिया, और उसको महत्‍व देकर उसके लिये उसके साथी हाकिमों के सिंहासनों से ऊँचा सिंहासन ठहराया।

2और राजा के सब कर्मचारी जो राजभवन के फाटक में रहा करते थे, वे हामान के सामने झुककर दण्‍डवत किया करते थे क्‍योंकि राजा ने उसके विषय ऐसी ही आज्ञा दी थी; परन्‍तु मोर्दकै न तो झुकता था और न उसको दण्‍डवत करता था।

3तब राजा के कर्मचारी जो राजभवन के फाटक में रहा करते थे, उन्‍हों ने मोर्दकै से पूछा, “तू राजा की आज्ञा क्‍यों उलंघन करता है?”

4जब वे उस से प्रतिदिन ऐसा ही कहते रहे, और उस ने उनकी एक न मानी, तब उन्‍हों ने यह देखने की इच्‍छा से कि मोर्दकै की यह बात चलेगी कि नहीं, हामान को बता दिया; उस ने तो उनको बता दिया था कि मैं यहूदी हूँ।

5जब हामान ने देखा, कि मोर्दकै नहीं झुकता, और न मुझ को दण्‍डवत करता है, तब हामान बहुत ही क्रोधित हुआ।

6उस ने केवल मोर्दकै पर हाथ चलाना अपनी मर्यादा के नीचे जाना। क्‍योंकि उन्‍हों ने हामान को यह बता दिया था, कि मोर्दकै किस जाति का है, इसलिये हामान ने क्षयर्ष के साम्राज्‍य में रहनेवाले सारे यहूदियों को भी मोर्दकै की जाति जानकर, विनाश कर डालने की युक्ति निकाली।

7राजा क्षयर्ष के बारहवें वर्ष के नीसान नाम पहिले महीने में, हामान ने अदार नाम बारहवें महीने तक के एक एक दिन और एक एक महीने के लिये ‘पूरः अर्थात् चिट्ठी अपने सामने डलवाई।

8और हामान ने राजा क्षयर्ष से कहा, “तेरे राज्‍य के सब प्रान्‍तों में रहनेवाले देश देश के लोगों के मध्‍य में तितर बितर और छिटकी हुई एक जाति है, जिसके नियम और सब लोगों के नियमों से भिन्न हैं; और वे राजा के कानून पर नहीं चलते, इसलिये उन्‍हें रहने देना राजा को लाभदायक नहीं है।

9यदि राजा को स्‍वीकार हो तो उन्‍हें नष्‍ट करने की आज्ञा लिखी जाए, और मैं राज के भण्‍डारियों के हाथ में राजभण्‍डार में पहुँचाने के लिये, दस हजार किक्‍कार चाँदी दूँगा।”

10तब राजा ने अपनी अँगूठी अपने हाथ से उतारकर अगागी हम्‍मदाता के पुत्र हामान को, जो यहूदियों का बैरी था दे दी।

11और राजा ने हामान से कहा, “वह चाँदी तुझे दी गई है, और वे लोग भी, ताकि तू उन से जैसा तेरा जी चाहे वैसा ही व्‍यवहार करे।”

12यों उसी पहिले महीने के तेरहवें दिन को राजा के लेखक बुलाए गए, और हामान की आज्ञा के अनुसार राजा के सब अधिपतियों, और सब प्रान्‍तों के प्रधानों, और देश देश के लोगों के हाकिमों के लिये चिट्ठियाँ, एक एक प्रान्‍त के अक्षरों में, और एक एक देश के लोगों की भाषा में राजा क्षयर्ष के नाम से लिखी गई; और उन में राजा की अँगूठी की छाप लगाई गई।

13और राज्‍य के सब प्रान्‍तों में इस आशय की चिट्ठियाँ हर डाकियों के द्वारा भेजी गई कि एक ही दिन में, अर्थात् अदार नाम बारहवें महीने के तेरहवें दिन को, क्‍या जवान, क्‍या बूढ़ा, क्‍या स्‍त्री, क्‍या बालक, सब यहूदी विध्‍वं सघात और नाश किए जाएँ; और उनकी धन सम्‍पत्ति लूट ली जाए।

14उस आज्ञा के लेख की नकलें सब प्रान्‍तों में खुली हुई भेजी गई कि सब देशों के लोग उस दिन के लिये तैयार हो जाएँ।

15यह आज्ञा शूशन गढ़ में दी गई, और डाकिए राजा की आज्ञा से तुरन्‍त निकल गए। और राजा और हामान तो दाखमधु पीने बैठ गए; परन्‍तु शूशन नगर में घबराहट फैल गई।


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