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1यहूदा के राजा आहाज के बारहवें वर्ष में एला का पुत्र होशे शोमरोन में, इस्राएल पर राज्‍य करने लगा, और नौ वर्ष तक राज्‍य करता रहा।

2उसने वही किया जो यहोवा की दृष्‍टि में बुरा था, परन्‍तु इस्राएल के उन राजाओं के बराबर नहीं जो उससे पहले थे।

3उस पर अश्‍शूर के राजा शल्‍मनेसेर ने चढ़ाई की, और होशे उसके अधीन होकर, उसको भेंट देने लगा।

4परन्‍तु अश्‍शूर के राजा ने होशे को राजद्रोह की गोष्‍ठी करनेवाला जान लिया, क्‍योंकि उसने ‘सोः नाम मिस्र के राजा के पास दूत भेजे, और अश्‍शूर के राजा के पास सालियाना भेंट भेजनी छोड़ दी; इस कारण अश्‍शूर के राजा ने उसको बन्‍दी बनाया, और बेड़ी डालकर बन्‍दीगृह में डाल दिया।

5तब अश्‍शूर के राजा ने पूरे देश पर चढ़ाई की, और शोमरोन को जाकर तीन वर्ष तक उसे घेरे रहा।

6होशे के नौवें वर्ष में अश्‍शूर के राजा ने शोमरोन को ले लिया, और इस्राएल को अश्‍शूर में ले जाकर, हलह में और गोजान की नदी हाबोर के पास और मादियों के नगरों में बसाया।

7इसका यह कारण है, कि यद्यपि इस्राएलियों का परमेश्‍वर यहोवा उनको मिस्र के राजा फि़रौन के हाथ से छुड़ाकर मिस्र देश से निकाल लाया था, तौभी उन्होंने उसके विरुद्ध पाप किया, और पराये देवताओं का भय माना,

8और जिन जातियों को यहोवा ने इस्राएलियों के सामने से देश से निकाला था, उनकी रीति पर, और अपने राजाओं की चलाई हुई रीतियों पर चलते थे।

9और इस्राएलियों ने कपट करके अपने परमेश्‍वर यहोवा के विरुद्ध अनुचित काम किए, अर्थात पहरुओं के गुम्‍मट से लेकर गढ़वाले नगर तक अपनी सारी बस्‍तियों में ऊँचे स्‍थान बना लिए;

10और सब ऊँची पहाडि़यों पर, और सब हरे वृक्षों के नीचे लाठें और अशेरा खड़े कर लिए।

11और ऐसे ऊँचे स्‍थानों में उन जातियों की सामने जिनको यहोवा ने उनके सामने से निकाल दिया था, धूप जलाया, और यहोवा को क्रोध दिलाने के योग्‍य बुरे काम किए,

12और मूरतों की उपासना की, जिसके विषय यहोवा ने उनसे कहा था, “तुम यह काम न करना।”

13तौभी यहोवा ने सब भविष्‍यद्वक्‍ताओं और सब दर्शियों के द्वारा इस्राएल और यहूदा को यह कह कर चिताया था, “अपनी बुरी चाल छोड़कर उस सारी व्‍यवस्‍था के अनुसार जो मैं ने तुम्‍हारे पुरखाओं को दी थी, और अपने दास भविष्‍यद्वक्‍ताओं के हाथ तूम्‍हारे पास पहुँचाई है, मेरी आज्ञाओं और विधियों को माना करो।”

14परन्‍तु उन्होंने न माना, वरन अपने उन पुरखाओं की समान, जिन्‍हों ने अपने परमेश्‍वर यहोवा का विश्‍वास न किया था, वे भी हठीले बन गए।

15और वे उसकी विधियों और अपने पुरखाओं के साथ उसकी वाचा, और जो चितौनियां उसने उन्‍हें दी थीं, उनको तुच्‍छ जानकर, निकम्‍मी बातों के पीछे हो लिए; जिस से वे आप निकम्‍मे हो गए, और अपने चारों और की उन जातियों के पीछे भी हो लिए जिनके विषय यहोवा ने उन्‍हें आज्ञा दी थी कि उनके से काम न करना।

16वरन उन्होंने अपने परमेश्‍वर यहोवा की सब आज्ञाओं को त्‍याग दिया, और दो बछड़ों की मूरतें ढालकर बनाई, और अशेरा भी बनाई; और आकाश के सारे गणों को दण्‍डवत की, और बाल की उपासना की।

17और अपने बेटे-बेटियों को आग में होम करके चढ़ाया; और भावी कहनेवालों से पूछने, और टोना करने लगे; और जो यहोवा की दृष्‍टि में बुरा था जिस से वह क्रोधित भी होता है, उसके करने को अपनी इच्‍छा से बिक गए।

18इस कारण यहोवा इस्राएल से अति क्रोधित हुआ, और उन्‍हें अपने सामने से दूर कर दिया; यहूदा का गोत्र छोड़ और कोई बचा न रहा।

19यहूदा ने भी अपने परमेश्‍वर यहोवा की आज्ञाएँ न मानीं, वरन जो विधियाँ इस्राएल ने चलाई थीं, उन पर चलने लगे।

20तब यहोवा ने इस्राएल की सारी सन्‍तान को छोड़ कर, उनको दुःख दिया, और लूटनेवालों के हाथ कर दिया, और अन्‍त में उन्‍हें अपने सामने से निकाल दिया।

21उसने इस्राएल को तो दाऊद के घराने के हाथ से छीन लिया, और उन्होंने नबात के पुत्र यारोबाम को अपना राजा बनाया; और यारोबाम ने इस्राएल को यहोवा के पीछे चलने से दूर खींचकर उनसे बड़ा पाप कराया।

22सो जैसे पाप यारोबाम ने किए थे, वैसे ही पाप इस्राएली भी करते रहे, और उनसे अलग न हुए।

23अन्‍त में यहोवा ने इस्राएल को अपने सामने से दूर कर दिया, जैसे कि उसने अपने सब दास भविष्‍यद्वक्‍ताओं के द्वारा कहा था। इस प्रकार इस्राएल अपने देश से निकालकर अश्‍शूर को पहुँचाया गया, जहाँ वह आज के दिन तक रहता है।।

24और अश्‍शूर के राजा ने बाबेल, कूता, अब्‍वाहमात और सपवैंम नगरों से लोगों को लाकर, इस्राएलियों के स्‍थान पर शोमरोंन के नगरों में बसाया; सो वे शोमरोन के अधिकारी होकर उसके नगरों में रहने लगे।

25जब वे वहाँ पहले पहले रहने लगे, तब यहोवा का भय न मानते थे, इस कारण यहोवा ने उनके बीच सिंह भेजे, जो उनको मार डालने लगे।

26इस कारण उन्होंने अश्‍शूर के राजा के पास कहला भेजा कि जो जातियाँ तू ने उनके देशों से निकालकर शोमरोन के नगरों में बसा दी हैं, वे उस देश के देवता की रीति नहीं जानतीं, उससे उसने उसके मध्‍य सिंह भेजे हैं जो उनको इसलिये मार डालते हैं कि वे उस देश के देवता की रीति नहीं जानते।

27तब अश्‍शूर के राजा ने आज्ञा दी, “जिन याजकों को तुम उस देश से ले आए, उन में से एक को वहाँ पहुँचा दो; और वह वहाँ जाकर रहे, और वह उनको उस देश के देवता की रीति सिखाए।”

28तब जो याजक शोमरोन से निकाले गए थे, उन में से एक जाकर बेतेल में रहने लगा, और उनको सिखाने लगा कि यहोवा का भय किस रीति से मानना चाहिये।

29तौभी एक एक जाति के लोगों ने अपने अपने निज देवता बनाकर, अपने अपने बसाए हुए नगर में उन ऊँचे स्‍थानों के भवनों में रखा जो शोमरोनियों ने बसाए थे।

30बाबेल के मनुष्‍यों ने तो सुक्‍कोतबनोत को, कूत के मनुष्‍यों ने नेर्गल को, हमात के मनुष्‍यों ने अशीमा को,

31और अव्वियों ने निभज, और तत्तराक को स्‍थापित किया; और सपवमी लोग अपने बेटों को अद्रम्‍मेलेक और अनम्‍मेलेक नाम सपवैंम के देवताओं के लिये होम करके चढ़ाने लगे।

32यों वे यहोवा का भय मानते तो थे, परन्‍तु सब प्रकार के लोगों में से ऊँचे स्‍थानों के याजक भी ठहरा देते थे, जो ऊँचे स्‍थानों के भवनों में उनके लिये बलि करते थे।

33वे यहोवा का भय मानते तो थे, परन्‍तु उन जातियों की रीति पर, जिनके बीच से वे निकाले गए थे, अपने अपने देवताओं की भी उपासना करते रहे।

34आज के दिन तक वे अपनी पहिली रीतियों पर चलते हैं, वे यहोवा का भय नहीं मानते।

35न तो अपनी विधियों और नियमों पर और न उस व्यवस्था और आज्ञा के अनुसार चलते हैं, जो यहोवा ने याकूब की सन्‍तान को दी थी, जिसका नाम उसने इस्राएल रखा था। उनसे यहोवा ने वाचा बान्‍धकर उन्‍हें यह आज्ञा दी थी, “तुम पराये देवताओं का भय न मानना और न उन्‍हें दण्‍डवत करना और न उनकी उपासना करना और न उनको बलि चढ़ाना।

36परन्‍तु यहोवा जो तुम को बड़े बल और बढ़ाई हुई भुजा के द्वारा मिस्र देश से निकाल ले आया, तुम उसी का भय मानना, उसी को दण्‍डवत करना और उसी को बलि चढ़ाना।

37और उसने जो जो विधियाँ और नियम और जो व्‍यवस्‍था और आज्ञाएँ तुम्‍हारे लिये लिखीं, उन्‍हें तुम सदा चौकसी से मानते रहो; और पराये देवताओं का भय न मानना।

38और जो वाचा मैं ने तुम्‍हारे साथ बान्‍धी है, उसे न भूलना और पराये देवताओं का भय न मानना।

39केवल अपने परमेश्‍वर यहोवा का भय मानना, वही तुम को तुम्‍हारे सब शत्रुओं के हाथ से बचाएगा।”

40तौभी उन्होंने न माना, परन्‍तु वे अपनी पहिली रीति के अनुसार करते रहे।

41अतएव वे जातियाँ यहोवा का भय मानती तो थीं, परन्‍तु अपनी खुदी हुई मूरतों की उपासना भी करती रहीं, और जैसे वे करते थे वैसे ही उनके बेटे पोते भी आज के दिन तक करते हैं।


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